-आज जैसी सुविधा होती तो 500 जवान कारगिल में शहीद नही होते
भवाली। केवल 18 साल 3 महीने की उम्र में कारगिल युद्ध के विनफोर्समेंट के तौर पर साथी घायलों को मिलेट्री अस्पताल तक पहुंचाने वाले कुमाऊं रेजिमेंट के सेवानिवृत्त जवान कुंदन चिलवाल बताते हैं कि आज भी जब उन्हें कारगिल की जंग व 12000-16000 फिट की ऊंचाई पर माइनस 10 डिग्री तापमान में भारत पाकिस्तान के बीच 1999 का कारगिल युद्ध आज भी हमारे जहन में जिंदा हैं। भारतीय इस लड़ाई को याद करके गर्व महसूस करते हैं। लेकिन इस युद्ध में भारत ने करीब 500 होनहार अफसरों को खोया था। कहा वह चाहते हैं कि उनके बेटे भी सैन्य अफसर बनें
कुंन्दन बताते हैं कि प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के निर्णय से जनरल बीपी मलिक ने थल सेना का ऑपरेशन विजय, वायु सेना का सफेद सागर, नौसेना का ऑपरेशन तलवार के साथ थल सेना का ऑपरेशन विजय लाँच किया। जिसका हिस्सा बनने का उन्हें सौभाग्य प्राप्त हुआ। जिसमें 2 नागा के जवानों ने 6 और 7 जुलाई को कारगिल में पॉइंट 4875 टूईन बम्प पर वापस कब्जा किया। सिपाही कैलाश कुमार, सिपाही राजेश सिपाही संजय गुरुंग, नाय देवेंद्र सिंह ने चढ़ाई के दौरान दुश्म की आर्टिलरी बमबारी के बीच ब फतह करने में प्राण न्यौछावर कर दिए थे। नायक देवेंद्र को वीरता पुरस्कार से अलंकृत किया गया। कुंदन सिह चिलवाल का कहना है कि जो जवान शहीद हो गए उनके परिवारों का सेना को पूरा ध्यान रखना ही चाहिए जो दिव्यांग हुए उनके परिजनों की सुध लेनी चाहिए। हालांकि उन्हें सरकार से कोई शिकायत नहीं है। लेकिन ऐसी नियमित व्यवस्था चाहते हैं कि सैनिकों के परिवारों की सुविधाओं व नियमित रूप से ध्यान रखा जाए आज के भारत-चीन के हालात कुंदन ने बताया कुमाऊं-नागा रेजीमें का गौरवशाली इतिहास स्वर्णि अक्षरों में दर्ज है। पहला परमवीर च विजेता होने के साथ चीन पर भार के इकलौते आक्रमण का श्रेय कुमाऊं रेजिमेंट को ही जाता है। बोफोर्स तोप के लिए 50 जवान चाहिए होते थे। अब बज्र टैंक में लोड हो गई है। पटका और ब्लेडप्रुफ जैकेट का वजन 22 किलो होता था। अब 6 केजी में हो जाते हैं। शहीद जवान के परिवारों व दिव्यांग जवानों व परिवारो के लिए राज्य सरकार को भी मदद करनी चाहिए। दिव्यांगों के परिवारो को नोकरी देनी चाहिए।
लेटैस्ट न्यूज़ अपडेट पाने हेतु -
👉 वॉट्स्ऐप पर हमारे समाचार ग्रुप से जुड़ें

