पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का कहना है कि अतिक्रमण चिह्नीकरण के नाम पर प्रदेश में आतंक का माहौल बनाया जा रहा है। ग्राम पंचायतों की भूमि पर हुए निर्माण को वन विभाग अतिक्रमण बता रहा है। रावत ने आरोप लगाया कि वन विभाग खुद पंचायतों के क्षेत्र में अतिक्रमण कर रहा है। राज्य सरकार को मामले का संज्ञान लेना होगा।
पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने रविवार को हल्द्वानी स्थित स्वराज आश्रम में पत्रकार वार्ता की। उन्होंने कहा कि वन पंचायतें गांवों की पूंजी हैं। प्रभावितों को सुनकर ऐसा लगता है कि उनकी ऊंगली पकड़कर गला दबाने का प्रयास किया जा रहा है। रावत ने कहा कि कई लोगों को सरकार ने लीज पर भूमि दी। जब वे लीज नवीनीकरण नहीं करा पाए तो सरकार ने उन्हें अतिक्रमणकारी बना दिया। गवर्नमेंट ग्रांट एक्ट के तहत जिन लोगों को जमीन के पट्टे आवंटित किए गए उन्हें भी अतिक्रमणकारी कह दिया गया। यही नहीं, गांव की जमीन या जंगल के नजदीक बसे लोगों को भी अतिक्रमणकारियों की श्रेणी में डाल दिया गया है। उन्होंने राज्य सरकार से मांग की कि वह तत्काल अतिक्रमण चिह्नीकरण की कार्रवाई रोके।
पूर्व सीएम ने कहा कि पहले के समय में जो सड़कें जिला सड़क कहलाती थी, बाद में उनमें से कई को स्टेट हाईवे और कुछ को नेशनल हाईवे बना दिया गया। जिला सड़कों के किनारे लोग उसी मानकों के अनुसार बसे हैं। अब उन पर स्टेट या नेशनल हाईवे के मानक लागू कर अतिक्रमणकारी मान लेना सही नहीं है।
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