सरकार के खिलाफ सड़को पर उतरेंगे व्यापारी, जिले में निकलेंगे जुलूस

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-ब्लॉक प्रमुख ने आंदोलन के लिए व्यापारियों से की अपील

भवाली। उत्तराखंड में हाईकोर्ट के आदेश के बाद सड़क किनारे अतिक्रमण को चिन्हित कर नोटिस जारी किए जा रहे हैं। ब्लॉक प्रमुख डॉ हरीश बिष्ट व पूर्व प्रधान संगठन अध्यक्ष संजीव भगत ने भी व्यापारियों के साथ मिलकर आंदोलन की तैयारी कर दी है। उन्होंने व्यापारियों से अपील कर कहा कि न्यायालय के आदेश पर प्रदेश में एक साथ कार्रवाई की जा रही है। सड़क किनारे दुकानों, आवासीय भवनों कच्चे पक्के निमार्ण को चिन्हित किया जा रहा है। सभी ग्रामीण क्षेत्र के दुकानदार अतिक्रमण हटाओ अभियान की चपेट में हैं। कहा कि प्रदेश के 13 जिलों में लगभग पच्चीस हजार से ज्यादा दुकानें और आवासीय भवन सरकार के इस अभियान की चपेट में आ सकते हैं। इन ढाबों, रेस्टोरेंट व दुकानों के मालिक व काम करने वाले लगभग एक लाख लोगो के परिवार पर इसका सीधा असर पड़ेगा। लोगों ने रोजगार के लिए बैकों से उधार लिया है। व्यवसायियों के पास बिजली पानी के कनेक्शन फूड लाइसेंस है, वे किसी न किसी कानून के तहत व्यापार कर रहे है। छोटे व्यापारियों से जिला पंचायत और नगर पालिका टैक्स वसूलते है। कुछ व्यापारी तो जीएसटी भी अदा करते हैं। पहाड़ी जिलों में सड़क किनारे दुकान या ढाबा खोलना रोजगार का सबसे बड़ा साधन है । सरकार रोजगार के इसी साधन पर डाका डाल रही है। वर्तमान में सरकारी और सेना की नौकरियां लगभग समाप्त हो चुकी है। अन्य रोजगार मिल पाना असंभव है। लोगो को हटाने से पहाड़ में पलायन बढ़ेगा और पहाड़ के गांव खाली होगें। कहा कि पहाड़ की सड़कें ही इस प्रकार बनायी जाती है कि सड़क से दूर रोजगार नही खोल सकते। दुकानें और मकान सड़क के पास ही बनाये जाते हैं। पहाडी जिलों की अधिकांश जमीन वन भूमि है। यहां लगभग 71% वन भूमि 10% वन पंचायत कि जमीनें है। समतल और अधिकांश नाप जमीन मैदानी जिलों में है। ऐसे हालत में पहाड़ों में खेती, बागान, व्यापार के लिए 10% से भी कम जमीन है। लोग सैकड़ो साल से वन भूमि में रहकर ही गुजर बसर कर रहे हैं। वन गुर्जरों से लेकर बिन्दुखत्ता, दमुआंढूगां चिडिय़ापुर वन क्षेत्र में लाखों लोग बरसों से रह रहे हैं। कहा कि उत्तराखण्ड में भू-कानून आज भी स्पष्ट नहीं हैं। जो लोग इन जगहों पर रहकर अपनी रोजी रोटी कमा रहे हैं उनमें से अधिकांश उत्तराखण्ड के मूल निवासी हैं।
पयर्टन व चारधाम यात्रा के लिहाज से भी ये लोग यात्रियों व पर्यटकों को सर छिपाने की जगह, भोजन, पानी उपलब्ध करा कर उनकी यात्रा को आसान बनाते है। उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में जमीन को पैमाइश ही विवादास्पद रही है, नाप भूमि के साथ नजूल, रोखड और बंजर भूमि, बेनाप भी होती है। जमीन की हिस्सेदारी, जो बहुत छोटी छोटी होती है। चकबन्दी न होने कारण जमीनों का स्वामित्व भी हमेशा स्पष्ट नहीं रहता। इन सब कारणों से सड़कों के किनारे बसने वाले लोग अपनी जमीनें का स्वामित्व भी प्रमाणित नहीं कर पाते। कहा कि सरकार को इस अतिक्रमण विरोधी अभियान को तुरन्त रोकना चाहिए। सरकार सड़क के किनारे वर्षों से रोजगार चला रहे लोगों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था भी करे। साथ ही जो लोग जिस जमीन में काबिज हैं उन्हे लम्बे समय तक लीज अथवा पट्टा जारी करना चाहिए। इस विषय में सरकार जनहित में कानून भी बना सकती है। सरकार चाहे तो भविष्य में अतिक्रमण रोकने के लिए भी कोई कानून बना सकती है। लोग अपने तरीके से अभी यह आक्रोश सभाओं और जनप्रतिनिधियों, ब्लाक प्रमुख, विधायकों के सामने प्रकट कर रहे हैं। पिछले पांच छः साल से व्यापार में मंदी हावी है। नोटबंदी जीएसटी और कोरोना के कारण कई लोगों के हाथों से काम पहले ही छिन चुका है। इस अभियान से छोटे व्यापारी भुखमरी की कगार पर पहुँच जायेगें। उन्होंने कहा कि तानाशाह सरकारों के खिलाफ सड़क में आंदोलन ही सबसे बड़ा हथियार है। कहा सभी लोग इस आंदोलन के लिए तैयार हो रहें है।

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