उत्तराखंड में पर्यावरण को बचाने के लिए राजस्व अभिलेख में दर्ज जलस्रोतों, नदियों, नालों और वन क्षेत्रों के पास एक निश्चित दूरी तक निर्माण पर सख्ती की जाएगी। शहरी क्षेत्र सुधार के लिए उत्तराखंड एकीकृत परिक्षेत्रीय विनियमन नीति (यूनिफाइड जोनिंग रेगुलेशंस) में इसका प्रावधान किया गया है।
इनके चारों ओर एक हरित बफर (ग्रीन बेल्ट) प्रस्तावित किया जाएगा, जिसमें किसी भी प्रकार के निर्माण की गतिविधियां नहीं की जाएंगी। इसके अलावा नदी-झीलों के 30 मीटर की परिधि में कोई नव निर्माण नहीं हो सकेगा। इसके तहत नदियों, जलाशयों और वनों के आसपास निर्माण निषेध क्षेत्र (नो कंस्ट्रक्शन जोन) का कड़ाई से पालन होगा। एक एकड़ या उससे बड़े जलस्रोतों को संरक्षित किया जाएगा और उन्हें भू-जल पुनर्भरण संसाधन के रूप में विकसित किया जाएगा।इसके अलावा किसी भी भवन या प्रोजेक्ट का नक्शा पास कराने के लिए संबंधित बोर्ड की सिफारिशें अनिवार्य होंगी। साथ ही, परिक्षेत्रीय नियमों के मामले में सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट, एनजीटी और सरकार की ओर से दिए गए आदेशों को ही सबसे ऊपर माना जाएगा।
पर्यावरण और वन विभाग से मंजूरी जरूरी
विकास से जुड़ी सभी गतिविधियों के लिए वर्ष 2006 के ‘पर्यावरण प्रभाव आकलन’ (ईआईए) नियमों का पालन करना होगा। अगर कोई प्रोजेक्ट वन भूमि या पेड़ों की कटाई से जुड़ा है, तो वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के तहत पहले सरकार से अनुमति लेनी होगी। बिना मंजूरी के काम शुरू करना गैर-कानूनी माना जाएगा।
तालाबों और झीलों का होगा संरक्षण
भू-जल स्तर को सुधारने के लिए यूनिफाइड जोनिंग रेगुलेशंस में सख्त कदम उठाए गए हैं। एक एकड़ या उससे बड़े सभी प्राकृतिक जलस्रोतों (तालाब, झील, जलाशय) को संरक्षित किया जाएगा। राजस्व रिकॉर्ड में जो जमीन तालाब या जलाशय के रूप में दर्ज है, उसे ‘वॉटर रिचार्ज सोर्स’ माना जाएगा। इनके क्षेत्रफल और संरक्षण की पूरी जानकारी सरकारी दस्तावेजों में शामिल की जाएगी, ताकि भविष्य में इन पर अतिक्रमण न हो सके। इसको लेकर तैयारी की गई है। नियमों को लेकर शासन-प्रशासन की ओर से सख्ती की जाएगी।
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