भवाली। नगर में मां नंदा सुनंदा की शोभायात्रा और महोत्सव की परंपरा करीब 106 वर्षों से चली आ रही है। वर्ष 1920 के आसपास शुरू हुई यह धार्मिक परंपरा आज भवाली की पहचान बन चुकी है। आजादी के करीब 20 वर्ष बाद, वर्ष 1967 में मेले को भव्य स्वरूप देने की पहल शुरू हुई। उस दौर में देवी मंदिर टीन की छत के नीचे था और नंदाष्टमी समेत अन्य अवसरों पर यहां पूजा अर्चना होती थी। स्थानीय लोगों के सहयोग से धीरे धीरे देवी मंदिर का निर्माण हुआ और नंदाष्टमी का आयोजन भी विस्तार लेने लगा। स्थानीय ठेकेदार रघुनाथ सिंह और देवी मंदिर के पुजारी स्व. केशव दत्त कपिल की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका रही। प्रेम सिंह बिष्ट और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बंशीधर कसल समेत कई लोगों ने मेले को आगे बढ़ाने में सक्रिय योगदान दिया।
बलि प्रथा बंद कर शुरू हुई नारियल चढ़ाने की परंपरा
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हीरालाल साह सहित अन्य लोगों के प्रयासों से देवी मंदिर में पशु बलि की परंपरा बंद कर नारियल चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई। 1980 के दशक तक देवी की शोभायात्रा में मूर्ति को डंडों के सहारे उठाकर नगर में घुमाया जाता था। अब मां की शोभायात्रा के लिए पीतल का भव्य डोला तैयार किया गया है।
देवी मंदिर के वर्तमान पुजारी मोहन चंद्र कपिल बताते हैं कि उनके पिता स्व. केशव दत्त कपिल को सपने में देवी से मिले संदेश के बाद भवाली में डोला यानी शोभायात्रा शुरू करने की प्रेरणा मिली। जिसके बाद स्व लीलाधर कपिल, स्व पूरन चन्द्र कपिल ने आगे बढ़ाया। वह मोहन चन्द्र कपिल तीसरी व चौथी पीढ़ी में इंद्र कपिल, पंकज कपिल, दीपेश कपिल धार्मिक अनुष्ठानों को आगे बढ़ा रहे हैं।
एक रुपये का चंदा भी माना जाता था बड़ी बात
पुजारी मोहन चन्द्र कपिल व स्थानीय लोगों के अनुसार वर्ष 1930 में महान संत नानतिन महाराज ने देवी मंदिर में मूर्ति की स्थापना करवाई थी। पुजारी मोहन चंद्र कपिल बताते हैं कि उस समय मंदिर के लिए एक रुपये का चंदा देने वाला व्यक्ति भी बड़ा सहयोगी माना जाता था। रेवती चौधरी आमा देवी की मूर्ति के वस्त्रों को रंगकर तैयार करती थीं। मूर्ति निर्माण में प्रेम सिंह बिष्ट, बच्ची सिंह बोरा और स्व. सतीश लाल साह का भी अहम योगदान रहा।
45 साल से मूर्ति गढ़ रहे स्थानीय लोग
मां नंदा सुनंदा की मूर्ति निर्माण की परंपरा को स्थानीय लोगों ने आज भी जीवंत रखा है। रविशंकर जोशी, पूरन भाकुनी, गणेश पंत, भुवन तिवारी, कंचन बेलवाल, मनीष साह सहित कई लोग पिछले करीब 45 वर्षों से मूर्ति निर्माण से जुड़े हैं। इनके साथ युवा भी परंपरा को आगे बढ़ाने में जुटे हैं, ताकि नई पीढ़ी अपनी संस्कृति और महोत्सव की विरासत से जुड़ी रहे।
आज भवाली का नंदा सुनंदा महोत्सव केवल नगर तक सीमित नहीं है। आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु मां के दर्शन के लिए भवाली पहुंचते हैं। वर्षों पुरानी आस्था, परंपरा और सामूहिक सहभागिता के साथ यह महोत्सव हर साल नए स्वरूप में भव्य होता जा रहा है।
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