आज रात देखें पर्सीड उल्कापात की आसमानी आतिशबाजी

ख़बर शेयर करें

आप सभी ने कभी न कभी “टूटता तारा” या “शूटिंग स्टार” के बारे में सुना हो… शायद इन्हें देखा भी हो। लेकिन क्या आप जानते हैं कि असल में इनका तारों से कोई लेना देना नहीं होता? टूटता तारा एक भ्रामक नाम है, सही नाम हिंदी में “उल्का” और अंग्रेजी में “meteor (मिटीऑर)” होता है। आइए जानें क्या होती हैं ये उल्काएँ।

किसी उल्का की उत्पत्ति वास्तव में धूमकेतु या क्षुद्रग्रह द्वारा अंतरिक्ष में होती है। चूँकि धूमकेतुओं और क्षुद्रग्रहों का द्रव्यमान बहुत कम होता है, उनका गुरुत्वाकर्षण बल भी कम होता है। जब ये सूर्य की परिक्रमा करते हुए सूर्य के पास आते हैं तो सूर्य के ताप और सौर पवन के कारण अपनी कक्षा में धूल और छोटे-छोटे कंकणों के बादल छोड़ते जाते हैं। आप इसकी तुलना रेत से भरे एक ट्रक से कर सकते हैं जो सड़क पर चलते चलते रास्ते में थोड़ी-थोड़ी रेत गिराते चलता है। जब पृथ्वी परिक्रमा करते हुए किसी ऐसे बादल से गुजरती है तो ये धूल और कंकण पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते हैं और पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण उन्हें धरती की तरफ तेजी से आकर्षित करता है। वायुमंडल के साथ घर्षण के कारण वे गर्म होकर जल जाते हैं और हमें चमकती हुई लकीर के रूप में कुछ क्षणों के लिए दिखाई देते हैं। जब किसी रात में बड़ी संख्या में उल्काएँ दिखाई देती हैं और उनकी कल्पना आकाश के किसी एक क्षेत्र से आते हुए की जा सके, तो इसे उल्कापात (अंग्रेजी में “meteor shower”) कहा जाता है।

यह भी पढ़ें 👉  रामनगर टैक्स बार की नई कार्यकारिणी निर्वाचित।

पूरे वर्ष कई उल्कापात सक्रिय रहते हैं, लेकिन अगस्त का पर्सीड उल्कापात और दिसंबर का जेमिनीड उल्कापात सबसे लोकप्रिय और शानदार होते हैं। वैसे तो पर्सीड लगभग जुलाई के मध्य से अगस्त के अंत तक सक्रिय रहता है लेकिन इसकी सर्वाधिक गतिविधि अगस्त के मध्य में होती है। पर्सीड नाम का अर्थ यह है कि यदि आप उल्काओं को आसमान में पीछे की ओर खींचें तो अधिकतर उल्काओं का उद्गम पर्शियस (Perseus) तारामंडल से होता हुआ प्रतीत होगा। पर्सीड उल्कापात स्विफ्ट-टटल नामक धूमकेतु से संबंधित है।

यह भी पढ़ें 👉  ग्राफिक एरा हिल यूनिवर्सिटी, भीमताल में बीबीए के नए बैच का उत्साहपूर्ण इंडक्शन कार्यक्रम

2026 में 12-13 अगस्त की रात में अधिकतम पर्सीड उल्काएँ दिखाई देंगीं। अमावस्या के कारण चंद्रमा भी आकाश में नहीं होगा और रात में घुप अंधेरा होगा। हालाँकि अगस्त के महीने में लगभग पूरे भारत में मानसून के बादल होते हैं जो पर्सीड देखने का मजा किरकिरा कर देते हैं, लेकिन अगर मध्यरात्रि के बाद कुछ घंटों के लिए भी आसमान खुल जाए तो आप औसतन प्रति घंटे 50-100 तक उल्काएँ देख सकते हैं। इन्हें देखने के लिए किसी दूरबीन की आवश्यकता नहीं होती। बस किसी ऐसे स्थान पर जाएँ जहाँ आसमान साफ हो और आसपास कृत्रिम रोशनी कम हो। आप आराम से लेटकर आकाश की ओर देखते रहें और यत्र तत्र उल्काएँ आसमानी आतिशबाजी का नजारा पेश करते रहेंगीं।

Join WhatsApp Group

You cannot copy content of this page