शैलेश मटियानी के अवदान को याद करने की जरूरत, सुभाष पंत

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 सुप्रसिद्ध कथाकार शैलेश मटियानी का रचना संसार इतना व्यापक है कि वह पहाड़ से शुरू होकर समुद्रों तक फैला हुआ है। उनके महत्वपूर्ण साहित्यिक अवदान के कारण ही कुमाऊँ विश्वविद्यालय ने उन्हें डी.लिट की मानद उपाधि प्रदान की थी। जीवन अत्यधिक संघर्षपूर्ण होने के बावजूद वह विलक्षण रचनाएँ करत रहे। चर्चित साहित्यकार राजेन्द्र यादव मटियानी जी को प्रेमचंद और फणीश्वरनाथ रेणु से बड़ा साहित्यकार मानते थे। प्रेमचंद हमारे मानस में बसे हुए हैं। बिहार का हर आदमी रेणु के साहित्य का प्रवक्ता है। सवाल यह है कि वो आदमी जिसने इतना बड़ा रचना संसार रचा है, वह प्रेमचंद या रेणु की तरह प्रसिद्ध क्यों नहीं है? हमें इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि इतना विशद साहित्य रचने वाले साहित्यकार को हमने भुला दिया है। इसी तरह से हम भूलते रहेंगे तो वह हमारी स्मृतियों से भी चले जायेंगे। उक्त विचार वरिष्ठ साहित्यकार सुभाष पंत ने कथाशिल्पी शैलेश मटियानी के 91वें जन्मदिन के अवसर पर कुमाऊँ विश्वविद्यालय की रामगढ स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ द्वारा आयोजित आॅनलाइन कार्यक्रम में व्यक्त किए।
 श्री पंत ने सुझाव दिया कि शैलेश मटियानी के नाम से सृजन पीठ की स्थापना की जानी चाहिए। उन पर अकादमिक सेमिनार और रचनाओं पर चर्चाएँ होनी चाहिए। उनकी कहानियाँ अद्भुत हैं, जिन पर नाटकों का मंचन किया जा सकता है। उनके साहित्यिक अवदान को याद करने और अवदान के मूल्यांकन की जरूरत है। इतने बड़े साहित्यकार को यदि हम भूलेंगे तो अपने को कभी माफ नहीं कर सकेंगे। उनके लिए काम किया जाना चाहिए।
 कार्यक्रम के दूसरे चरण में वरिष्ठ कथाकार सुभाष पंत ने अपनी 'जिन्न' कहानी का पाठ किया। 1998 के आसपास छपी यह कहानी हाल ही में काव्यांश प्रकाशन से प्रकाशित उनके कहानी संग्रह 'इक्कीसवीं सदी की एक दिलचस्प दौड़' में शामिल है। यह कहानी तकनीक के विरोध की नहीं बल्कि तकनीक जो उपभोक्तावाद पैदा करती है, उसके विरोध की कहानी है।
 कार्यक्रम में महादेवी वर्मा सृजन पीठ के निदेशक प्रो. शिरीष कुमार मौर्य, शोध अधिकारी मोहन सिंह रावत सहित वरिष्ठ साहित्यकार हरीश चन्द्र पाण्डे, शशिभूषण बडोनी, डाॅ. विजया सती, मुकेश नौटियाल, डाॅ. खेमकरण सोमन, प्रबोध उनियाल, असीम अग्रवाल, प्रो. मानवेन्द्र पाठक, मदन बिष्ट, डाॅ. शिव प्रकाश त्रिपाठी, लक्ष्मण वृजमुख, उषा नौडियाल, खीम सिंह रावत, डाॅ. शांति चंद, लक्ष्मण बिष्ट, डाॅ. विवेकानंद पाठक, अरविंद कुमार मौर्य, सुमन खेर, मेहनाज पाशा, सुकान्त ममगाई, प्रथम पंत, कुमार प्रणव, भगवती प्रसाद जोशी, बहादुर सिंह कुँवर आदि साहित्य-प्रेमी उपस्थित थे।
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